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अंतरराष्ट्रीय मंच पर गूंजा बांधवगढ़ का मॉडल

मोहम्मद सईद 

शहडोल 6 सितंबर। जंगल को सिर्फ बचाने की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जंगल से जुड़े समुदायों के लिए सम्मानजनक और सतत आजीविका का माध्यम भी बनाया जा सकता है। मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व ने इस सोच को जमीन पर उतारकर दिखाया है। यही वजह रही कि नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय टाइगर लैंडस्केप कार्यशाला में बाँधवगढ़ के इकोटूरिज्म मॉडल की जमकर सराहना हुई।
अंतर्राष्ट्रीय बिग कैट अलायंस (IBCA), एशियाई विकास बैंक (ADB) तथा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार के संयुक्त तत्वावधान में इंदिरा पर्यावरण भवन स्थित गंगा सभागार में आयोजित इस कार्यशाला में ‘टाइगर लैंडस्केप: संरक्षण, जैव-अर्थव्यवस्था और इकोटूरिज्म’ विषय पर देश-विदेश के विशेषज्ञों ने मंथन किया। कार्यशाला का केंद्रीय विचार स्पष्ट था—जंगल केवल संरक्षण की वस्तु नहीं, बल्कि स्थानीय समुदायों के लिए सतत आय और विकास का आधार भी बन सकते हैं। इसी सोच के बीच बांधवगढ़ का अनुभव अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने एक प्रभावी उदाहरण के रूप में उभरा।

बांधवगढ़ की कहानी पहुंची अंतरराष्ट्रीय मंच पर
कार्यशाला के दूसरे दिन आयोजित थिमेटिक सत्र ‘इकोटूरिज्म एवं सामुदायिक भागीदारी: होम-स्टे, गाइडिंग, रेवेन्यू-शेयरिंग और विजिटर मैनेजमेंट मॉडल’ में बाँधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक डॉ. अनुपम सहाय, IFS को एक्सपर्ट पैनलिस्ट के रूप में आमंत्रित किया गया। सत्र की अध्यक्षता मध्यप्रदेश के शुभरंजन सेन, IFS, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख ने की। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक
डॉ. सहाय ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने बांधवगढ़ के इकोटूरिज्म मॉडल की तस्वीर पेश करते हुए बताया कि किस तरह प्रशिक्षित गाइड और वाहन चालक टाइगर रिजर्व प्रबंधन के साथ मिलकर पर्यटकों को केवल जंगल और वन्यजीवों का दर्शन ही नहीं कराते, बल्कि उन्हें वन एवं वन्यजीव संरक्षण की सोच से भी जोड़ते हैं।
बांधवगढ़ मॉडल की सबसे खास बातों में से एक पर्यटन से होने वाली आय में स्थानीय समुदाय की सीधी भागीदारी है। मध्यप्रदेश के टाइगर रिजर्वों में पर्यटन से प्राप्त राजस्व की एक-तिहाई राशि स्थानीय समुदाय तक पहुंचाने की व्यवस्था का उदाहरण भी कार्यशाला में रखा गया। इस व्यवस्था ने यह संदेश दिया कि यदि जंगल के आसपास रहने वाले लोगों को संरक्षण से जोड़कर उसके लाभ में भागीदार बनाया जाए तो वे केवल वन संरक्षण के लाभार्थी नहीं, बल्कि संरक्षण व्यवस्था के सक्रिय भागीदार भी बन सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने इस मॉडल को विशेष रुचि के साथ समझा।

डॉ. सहाय ने बताया कि मध्यप्रदेश में समुदाय आधारित इकोटूरिज्म की विभिन्न पहलों से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर तैयार हुए हैं। स्थानीय समुदाय द्वारा होम-स्टे का संचालन, जिप्सी वाहन संचालन, पारंपरिक खान-पान के स्टॉल, गाइडिंग तथा स्थानीय होटल और रिसॉर्ट में प्रशिक्षित कर्मियों के रूप में काम जैसे अवसरों ने पर्यटन को गांवों की अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया है। इसका असर केवल रोजगार तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ने से वन पर दबाव कम करने, मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व मजबूत करने और संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने में भी मदद मिल रही है।
यानी जंगल बचाने की जिम्मेदारी अब सिर्फ वन विभाग की नहीं रह गई, बल्कि जंगल से जुड़े लोग भी इस अभियान के हिस्सेदार बन रहे हैं।

दुनिया के सामने मध्यप्रदेश आने का न्योता

कार्यशाला में बांधवगढ़ मॉडल की प्रस्तुति के बाद डॉ. सहाय ने देश-विदेश से आए प्रतिनिधियों को मध्यप्रदेश आने का आत्मीय आमंत्रण दिया। उनका संदेश बेहद खास रहा “We are just a roar away from you, any day, anytime.” बांधवगढ़ की दहाड़ के साथ दिया गया यह निमंत्रण न केवल पर्यटकों को आकर्षित करने वाला संदेश था, बल्कि उस सोच का भी प्रतीक बना जिसमें वन्यजीव संरक्षण, स्थानीय समुदाय और पर्यटन तीनों एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं।

इनकी रही सहभागिता 

कार्यशाला में भारत के साथ भूटान, बांग्लादेश, कंबोडिया, नेपाल, वियतनाम और मलेशिया सहित कई देशों के प्रतिनिधियों, भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारियों तथा WWF, IUCN और UNDP के विशेषज्ञों ने भाग लिया। केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव ने कार्यशाला का उद्घाटन किया तथा IBCA और ADB के बीच एमओयू का आदान-प्रदान भी हुआ।

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